सत्य, यह एक ऐसा तथ्य जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं, जीवन का आरम्भ क्यों होता है और उसका अंत क्यों होता है अर्थात मृत्यु क्यों होती है, इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है, संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं - भौतिक स्तर पर हमें जीवन-मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल हम पदार्थ (भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं, परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता, कारण कौन है, मेरे मत से वही कारण ही सत्य है ! आइये इस प्रार्थना से आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए उस सत्य की खोज में -
ॐ असतो मा सद्गमय | तमसो मा ज्योतिर्गमय ||
मृत्योर्मामृतं गमय || ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !!!


4 मई 2011

भिखारी का ज्ञानोपदेश - ईशावास्योपनिषद

यह प्राचीन काल के दो ऋषियों से सम्बंधित वृतांत है। उस प्राचीन युग में शौनक कापी और अभिद्रतारी दो ऋषि थे, दोनों एक ही आश्रम में रहते हुए ब्रह्मचारियों को शिक्षा-दीक्षा दिया करते थे। 


दोनों ऋषियों के आराध्य देव वायु देवता थे। वे उन्ही की उपासना करते थे। 


एक बार दोनों ऋषि दोपहर का भोजन करने बैठे। तभी! एक भिक्षुक अपने हाथ में भिक्षा पात्र लिए उनके पास आया और बोला - हे ऋषिवर! मैं कई दिनों से भूखा हूँ। कृपा करके मुझे भी भोजन दे दीजिए। 


भिखारी की बात सुन कर दोनों ऋषियों ने उसे घूरकर देखा और बोले - हमारे पास यहीं भोजन है, यदि हम अपने भोजन में से तुझे भी भोजन दे देंगें तो हमारा पेट कैसे भरेगा। ... चल भाग यहाँ से .....। 


उनकी ऐसी बातें सुनकर उस भिखारी ने कहा - हे ऋषिवर! आप लोग तो ज्ञानी हैं,  और ज्ञानी होकर भी ये कैसी बातें करते हैं? क्या आप जानते नहीं की दान श्रेष्ठ कर्म, भूखे को भोजन करना, प्यासे को पानी देना महान पुण्य का कर्म है। इन कर्मों को करने से मनुष्य महँ बन जाता है, यह शास्त्रों का कथन है।  इसलिए कृपा करके मुझ भूखे को भी कुछ खाने को दीजिए, और पुण्य कमाइए। 


ऋषियों ने उसे विश्मित नजरों से देखते हुए सोचा - बड़ा ही विचित्र व्यक्ति है। हमारे मना करने पर भी भोजन मांग रहा है। 


दोनों ऋषि उसे कुछ पलों तक घूरते रहे, फिर स्पष्ट शब्दों में बोले - हम तुझे अन्न का एक दाना भी नहीं देंगे। फिर भी वह भिखारी वाहन से नहीं हिला और बोला - किन्तु मेरे प्रश्नों का उत्तर देने में तो आपकों कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।  


हाँ-हाँ पूछो-पूछो ! दोनों ऋषियों ने सम्मिलित स्वर में उत्तर दिया।  तब उसने पूछा - आपके आराध्य देव कौन है।  
ऋषियों ने उत्तर दिया - वायु देवता हमारे आराध्य देव हैं। वहीँ वायु देवता जिन्हें प्राण तथा श्वास भी कहते हैं।  
तब भिखारी ने कहा तब तो तुम्हे यह भी ज्ञात होगा की वायु सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है, क्योंकि वहीँ प्राण है।  
हम जानते हैं, दोनों ऋषियों ने एक स्वर में कहा।  
फिर भिखारी ने पूछा, अच्छा ये बताओ के तुम भोजन करने से पूर्व भोजन किस देवता को अर्पण करते हो ? 


बड़े अटपटे से भाव में ऋषियों ने कहा यह भी कोई पूछने की बात है - हम भोजन वायु देवता को अर्पित करते हैं, और हमने अब भी किया है।  क्योंकि वायु ही प्राण हैं, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। 


भिखारी ने लंबी गहरी श्वास ली, और शांत भाव से बोला - यहीं मैं तुम्हारे मुहं से सुनाने को उत्सुक था। जब तुम प्राण को भोजन अर्पित करते हो और प्राण पूरे विश्व में समाये हैं तो क्या मैं उस ब्रह्माण्ड (विश्व) से अलग हूँ।  क्या मुझमें भी वहीँ प्राण नहीं हैं?


हमने पता है, ऋषियों ने झल्लाकर कहा। 


इस पर भिखारी बोला - जब तुम्हे मालूम है, तो मुझे भोजन क्यों नहीं देते।  संसार को पालने वाला ईश्वर ही है, वही सबका प्रलय रूप भी है।  फिर भी तुम इश्वर की कृपा क्यों नहीं समझते ? लगता है, तुम सर्वशक्तिमान से अनभिज्ञ हो।  यदि तुम्हें ज्ञात होता कि ईश्वर क्या है, तो मुझे भोजन को मना न करते । 


जब ईश्वर ने वायु रूप प्राण से भी जीवों की रचना की है, तब तुम आचार्य हो कर भी क्यों उसकी रचना में भेड़ कर रहे हो। जो प्राण तुममे समाये हैं, वहीँ प्राण मुझमें भी हैं। फिर तुम्हारी तरह मुझे भोजन क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्यों तुम मुझे भोजन से वंचित रखना चाहते हो?


एक भिखारी के द्वारा ऐसी ज्ञान भरी बातें सुनकर, दोनों ऋषि आश्चर्यचकित रह गए और विस्मित दृष्टि से उसे देखने लगे।  वे समझ गए की यह कोई बहुत ही ज्ञानवान पुरुष हमने उपदेश देने आया है, वे बोले -
ये भद्र! ऐसा नहीं है, कि हमने उस परमपिता परमेश्वर का ज्ञान नहीं है।  हम जानते हैं, कि जिसने सृष्टि की रचना की है, वह ही प्रलयकाल में स्वरचित सृष्टि को लील भी जाता है।  साथ ही हमने यह भी मालूम है कि स्थूल रूप से दृष्टिगोचर वस्तु, अंत में सूक्ष्म रूप से उसी परमात्मा में विलीन हो जाती है।  किन्तु हे भद्र! उस परमपिता को हमारी तरह भूख नहीं लगती है, और न ही वो हमारी तरह भोजन करता है, जब उसे भूख लगती है, तब वह इस सृष्टि को ही भोजन रूप में ग्रहण कर लेता है।  विद्वान मनुष्य उसी परमपिता की आराधना करते हैं।  
इस संवाद के बाद ऋषियों ने भिखारी को अपने साथ बिठाया और भोजन कराया और बाद में उस भिखारी से शाश्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया। 


ईशावास्योपनिषद - 


ईशा वास्यं इदं सर्वं यत् किं च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम्।।

(संसार में ऐसा तो कुछ है ही नहीं और ना ही कोई ऐसा है, जिसमें ईश्वर का निवास न हो। तुम त्यागपूर्वक भोग करो। अपने पास अतिरिक्त संचय न करो। लोभ में अंधे न बनो। पैसा किसी का हुआ नहीं है) इसलिए धन से परोपकार करों !!!! 


ओम शांति: शांति: शांति:

20 मार्च 2011

होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से


आत्मज्ञान से, होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 
छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)


पंडित खेलै पोथी पत्रा से, मुल्ला किताब कुरान से,
जोगी खेले जोग जुगत से, अभिमानी खेलै अभिमान से ।
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 

छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)



कामी खेलै कामिनि के संग, लोभी खेलत दाम से,
पतिव्रता खेलै अपने पति संग, वैश्या सकल जहान से ।

होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 
छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)



अति प्रचंड तेज माया को, तकि तकि मारत बान से,
कोटिन माहि बचे कोई बिरला, कहे कबीर गुरु ग्यान से ।

होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से 
छिन छिन पल पल घड़ि घड़ि होरी निशिदिन आठों जाम से 
होरी खेलत संत सुजान, आत्मज्ञान से ।। (२)


5 फ़र॰ 2011

आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है


आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है
अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है 
आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है
अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है 
फूलों में जो सुवास,  ईख में मिठास है
भगवान् का तो  विश्व के  कण-कण में वास है


आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है
अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है 

26 जन॰ 2011

सर्वबंधनों और दुखों के मूल कारण

महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार सर्वबंधनों और दुखों के मूल कारण पांच क्लेश हैं - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश !


अब इन कारणों को समझते हैं -

अविद्या - अनित्य में नित्य, अशुद्ध में शुद्ध, दुःख में सुख, अनात्म में आत्म समझना अविद्या है ! इस अविद्या रुपी क्षेत्र में ही अन्य चारों क्लेशों का जन्म होता है !

अस्मिता - चित्त जड़ रूप है, और चेतन पुरूष चिति कहा जाता है ! इस अविद्या के कारण जड़ चित्त और  चेतन पुरुष चिति में भेद नहीं रहता ! यह अविद्या से उत्पन्न हुआ चित्त और चिति में अविवेक अस्मिता क्लेश कहलाता है !

26 दिस॰ 2010

मानव से महामानव बनने के लिए - जगत के मिथ्या होने का प्रतिपादन

पिछली पोस्ट में आपने जगत की भ्रमरूपता के विषय में पढ़ा की किस प्रकार यह संसार न होते हुए भी इन्द्रियों के द्वारा दृश्यमान होता है और अनुभव में आता है !
इस प्रकार एक स्वाभाविक प्रश्न स्वतः ही जन्म ले लेता है, की फिर यहाँ किया हुआ पाप पुण्य सब, अच्छा-बुरा, आत्मा परमात्मा सब भ्रमरूप ही हैं !
परन्तु संसार को मिथ्या समझने पर कर्म विहीनता और पलायन की स्थिति उत्तपन्न होगी, जो समाज के लिए हितकर नहीं !! भारतीय दर्शन पलायान का नहीं अपितु कर्म का दर्शन है, ऐसे में महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित शास्त्र और श्रीराम को भगवान् बनाने वाला संवाद भला पलायन की अनुमति कैसे दे सकता है !

21 नव॰ 2010

जगत की भ्रमरूपता


यह जगत संकल्प के निर्माण, मनोराज्य के विलास, इंद्रजाल द्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानी के अर्थ के प्रतिभास, वातरोग के कारण प्रतीत होने वाले भूकंप, बालक को डराने के लिए कल्पित पिशाच, निर्मल आकाश में कल्पित मोतियों के ढेर, नाव के चलने से तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षों की गति, स्वप्न में देखे गए नगर, अन्यत्र देखे गए फूलों के स्मरण से आकाश से आकाश में कल्पित हुए पुष्प की भांति भ्रम द्वारा निर्मित हुआ है !

मृत्युकाल में पुरुष स्वयं अपने हृदय में इसका अनुभव करता है ! (यहाँ मृत्यु से अभिप्राय शरीरांत नहीं है) 

5 नव॰ 2010

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ... (2)
जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाही .... (2)

मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आई ... (2)

पता जब लगा मेरी हस्ती का मुझको ....
पता जब लगा मेरी ..
पता जब लगा मेरी हस्ती का मुझको...(2)
सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नाही ....(2)
मुझे मेरी मस्ती कहाँ लेके आ ..आ ...आई ..(2)

सभी में सभी में पड़ा मैं ही मैं हूँ ...(3)
सिवा मेरे अपने कहीं कुछ नाही....(2)



यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पूर्ति करने के लिए होते, तो भी लिखते-लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते !!
(कुरान, अध्याय ३१, पद ११)

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