सत्य, यह एक ऐसा तथ्य जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं, जीवन का आरम्भ क्यों होता है और उसका अंत क्यों होता है अर्थात मृत्यु क्यों होती है, इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है, संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं - भौतिक स्तर पर हमें जीवन-मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल हम पदार्थ (भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं, परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता, कारण कौन है, मेरे मत से वही कारण ही सत्य है ! आइये इस प्रार्थना से आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए उस सत्य की खोज में -
ॐ असतो मा सद्गमय | तमसो मा ज्योतिर्गमय ||
मृत्योर्मामृतं गमय || ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !!!


20/08/2010

सृष्टि की उत्त्पत्ति का सत्य


वैज्ञानिकों से लेकर साधारण मानव तक सभी यह जानना चाहतें है की सृष्टि की उत्त्पत्ति कैसे हुई, कब और क्यों हुई, परन्तु वैज्ञानिक आंकड़ों और संभावनाओं में उलझे हुए हैं, और धर्माधिकारी अपने-अपने धर्म के अनुसार सृष्टि की उत्त्पत्ति की विवेचना करते हैं, और साधारण आदमी के पास इतना समय ही नहीं है कि वो पदार्थ जगत की कल्पना को छोड़ कर इन जटिल विषयों की और ध्यान लगाये !
सृष्टि की उत्त्पत्ति के विषय में विज्ञान अभी भी अपूर्ण ज्ञान रखता है, यदि धर्मों की बात की जाए तो इस्लाम और ईसाईयत में सृष्टि की उत्त्पत्ति को परमेश्वर की छः दिनों का कार्य बताया गया है और सातवें दिन परमेश्वर के आराम का दिन कहा गया है ! इन धर्मों में सृष्टि रचना का जो क्रम विवरित है वो भी कहीं से तर्कपूर्ण और वैज्ञानिक नहीं जान पड़ता है !


सृष्टि की उत्त्पत्ति के विषय में वैदिक ज्ञान अधिक वैज्ञानिक और प्रासंगिक जान पड़ता है ! आइये जाने सृष्टि की उत्त्पत्ति का सत्य उपनिषदों की दृष्टि से :-

सृष्टि के आरम्भ में एकमात्र 'आत्मा' का विराट ज्योतिर्मय स्वरूप विद्यमान था ! तब उस आत्मा ने विचार किया कि सृष्टि का सृजन किया जाये और विभिन्न लोक बनाये जायें तथा उनके लोकपाल निश्चित किये जायें ! ऐसा विचार कर आत्मा ने अम्भ, मरीचि, मर और आप लोकों की रचना की। द्युलोक से परे स्वर्ग की प्रतिष्ठा रखने वाले लोक को 'अम्भ' कहा गया। मरीचि को अन्तरिक्ष, अर्थात प्रकाश लोक (द्युलोक) कहा गया, पृथिवी लोक को मर, अर्थात मृत्युलोक नाम दिया गया, पृथिवी के नीचे जलीय गर्भ को पाताललोक (आप:) कहा गया!


लोकों की रचना करने के उपरान्त परमात्मा ने लोकपालों का सृजन करने की इच्छा से आप: (जलीय गर्भ) से 'हिरण्य पुरुष' का सृजन किया! सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ से अण्डे के रूप का एक मुख प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्री, वाक् इन्द्री से 'अग्नि' उत्पन्न हुई ! तदुपरान्त नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से 'प्राण' और प्राण से 'वायु' उत्पन्न हुई। फिर नेत्र उत्पन्न हुए! नेत्रों से चक्षु (देखने की शक्ति) प्रकट हुए और चक्षु से आदित्य प्रकट हुआ। फिर त्वचा, त्वचा से 'रोम' और रोमों से वनस्पति-रूप 'औषधियां' प्रकट हुईं। उसके बाद 'हृदय', हृदय से 'मन, 'मन से 'चन्द्र' उदित हुआ। तदुपरान्त नाभि, नाभि से 'अपान' और अपान से 'मृत्यु' का प्रादुर्भाव हुआ। फिर 'जननेन्द्रिय, 'जननेन्द्रिय से 'वीर्य' और वीर्य से 'आप:' (जल या सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई !

(ऐतरेय उपनिषद से संकलित)

क्रमश
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सत्य के महासाधक को समर्पित



यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पूर्ति करने के लिए होते, तो भी लिखते-लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते !!
(कुरान, अध्याय ३१, पद ११)

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