सत्य, यह एक ऐसा तथ्य जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं, जीवन का आरम्भ क्यों होता है और उसका अंत क्यों होता है अर्थात मृत्यु क्यों होती है, इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है, संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं - भौतिक स्तर पर हमें जीवन-मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल हम पदार्थ (भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं, परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता, कारण कौन है, मेरे मत से वही कारण ही सत्य है ! आइये इस प्रार्थना से आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए उस सत्य की खोज में -
ॐ असतो मा सद्गमय | तमसो मा ज्योतिर्गमय ||
मृत्योर्मामृतं गमय || ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !!!


05/09/2010

मनुष्य शरीर ही ब्रह्माण्ड है

महासर्ग के आदि में जगत की रचना करने वाले परम पुरुष परमेश्वर ने विचार किया की मैं जिस ब्रह्माण्ड की रचना करना चाहता हूँ, उसमें एक ऐसा कौन-सा तत्व डाला जाय की जिसके रहने पर मैं स्वयं भी उसमें रह सकूं अर्थात मेरी सत्ता स्पष्ट रूप से व्यक्त रहे और जिसके रहने पर मेरी सत्ता स्पष्ट रूप से प्रतीत होती रहे ! परब्रह्म परमेश्वर ने सर्वप्रथम सबके प्राणरूप सर्वात्मा हिरण्यगर्भ को बनाया ! उसके बाद शुभ कर्म में प्रवृत करने वाली श्रद्धा अर्थात आस्तिक बुद्धि को प्रकट करके फिर क्रमश: शारीर के उपादान भूत - आकाश, वायु, तेज, जल, और पृथ्वी - इन पांच महाभूतों की सृष्टि की ! इन पांच महाभूतों के बाद परमेश्वर ने - मन, बुद्धि, चित्त, और अंहकार- इन चारों के समुदायरूप अन्त:करण को रचा ! फिर विषयों के ज्ञान और कर्म के लिए पांच ज्ञानेन्द्रियों तथा पांच कर्मेन्द्रियों को उत्पन्न किया, फिर प्राणियों के शरीर की स्थिति के लिए अन्न की और अन्न की और अन्न के परिपाक द्वारा बल की सृष्टि की ! उसके बाद अन्त:करण के संयोग से इन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले कर्मों का निर्माण किया ! उनके भिन्न-भिन्न फलरूप लोकों को बनाया और उन सबके नामों की रचना की ! इस प्रकार सोलह कलाओं से युक्त इस ब्रह्माण्ड की रचना करके जीवात्मा के सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गए; इसीलिए वे सोलह कलाओं वाले पुरुष कहलाते हैं ! हमारा यह मनुष्य शरीर भी ब्रह्माण्ड का ही एक छोटा सा नमूना है, अत: जिस प्रकार परमेश्वर इस सारे ब्रह्माण्ड में हैं, उसी प्रकार हमारे इस शरीर में भी हैं और इस शरीर में भी वह सोलह कलाएं वर्तमान में विद्यमान हैं !
उन हृदयस्थ परमदेव पुरुषोत्तम जान लेने से ही इस सम्पूर्ण सृष्टि का ब्रह्माण्ड का और उस महान सत्य को को जाना जा सकता है, इसके इसके अतिरिक्त और कोई भी साधन नहीं है !

2 टिप्‍पणियां:

सत्य के महासाधक को समर्पित



यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पूर्ति करने के लिए होते, तो भी लिखते-लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते !!
(कुरान, अध्याय ३१, पद ११)

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