सत्य, यह एक ऐसा तथ्य जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं, जीवन का आरम्भ क्यों होता है और उसका अंत क्यों होता है अर्थात मृत्यु क्यों होती है, इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है, संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं - भौतिक स्तर पर हमें जीवन-मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल हम पदार्थ (भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं, परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता, कारण कौन है, मेरे मत से वही कारण ही सत्य है ! आइये इस प्रार्थना से आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए उस सत्य की खोज में -
ॐ असतो मा सद्गमय | तमसो मा ज्योतिर्गमय ||
मृत्योर्मामृतं गमय || ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !!!


21/11/2010

जगत की भ्रमरूपता


यह जगत संकल्प के निर्माण, मनोराज्य के विलास, इंद्रजाल द्वारा रचित पुष्पहार, कथा-कहानी के अर्थ के प्रतिभास, वातरोग के कारण प्रतीत होने वाले भूकंप, बालक को डराने के लिए कल्पित पिशाच, निर्मल आकाश में कल्पित मोतियों के ढेर, नाव के चलने से तथा प्रतीत होनेवाली वृक्षों की गति, स्वप्न में देखे गए नगर, अन्यत्र देखे गए फूलों के स्मरण से आकाश से आकाश में कल्पित हुए पुष्प की भांति भ्रम द्वारा निर्मित हुआ है !

मृत्युकाल में पुरुष स्वयं अपने हृदय में इसका अनुभव करता है ! (यहाँ मृत्यु से अभिप्राय शरीरांत नहीं है) 
इस प्रकार जगत मिथ्या होने पर भी चिरकाल तक अत्यंत परिचय में आने के कारण घनिभाव(दृढ़ता) को प्राप्त होकर जीव के हृदयाकाश में प्रकाशित हो बढ़ने लगता है ! यह क्षेत्र इहलोक कहलाता है ! जन्म से लेकर मृत्यु तक की चेष्टाओं तथा मरण आदि का अनुभव करने वाला जीव वहीँ (हृदयाकाश में ही) इहलोक की कल्पना करता है, जिसको पहले भी बताया गया है ! फिर मरने (शरीर का अंत) के अनन्तर वह वहीँ परलोक की कल्पना करता है ! 
वासना के भीतर अन्य अनेक शरीर और उनके भीतर भी दूसरे-दूसरे, भिन्न-भिन्न शरीर - 
--- ये इस संसार में केले के वृक्ष की त्वचा (छिलके या वल्कल) के सामान एक के पीछे एक प्रतीत होते हैं ! 
न तो पृथ्वी आदि पञ्च-महाभूतों के समुदाय हैं और न जगत की सृष्टि का कोई क्रम ही है ! यह विभिन्न रूप दिखने वाले सब के सब मिथ्या हैं ! तथापि मृत और जीवित जीवों को इनमे संसार का भ्रम होता है ! यह अविद्या विभिन्न धाराओं में फैलती है ! मूढ़ पुरूष के लिए यह इतनी विशाल है की, वे इसे पार नहीं कर सकते ! सृष्टिरुपी चंचल तरंगो से ही यह अविद्या तरंगवती जान पड़ती है और संसार यथावत जान पड़ता है !

जबकि सच तो इतना ही है - यहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नाही
                                                                                
                                                          श्री योगवाशिष्ठ महारामायण 

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सत्य के महासाधक को समर्पित



यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पूर्ति करने के लिए होते, तो भी लिखते-लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते !!
(कुरान, अध्याय ३१, पद ११)

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