सत्य, यह एक ऐसा तथ्य जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं, जीवन का आरम्भ क्यों होता है और उसका अंत क्यों होता है अर्थात मृत्यु क्यों होती है, इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है, संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं - भौतिक स्तर पर हमें जीवन-मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल हम पदार्थ (भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं, परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता, कारण कौन है, मेरे मत से वही कारण ही सत्य है ! आइये इस प्रार्थना से आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए उस सत्य की खोज में -
ॐ असतो मा सद्गमय | तमसो मा ज्योतिर्गमय ||
मृत्योर्मामृतं गमय || ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !!!


26/12/2010

मानव से महामानव बनने के लिए - जगत के मिथ्या होने का प्रतिपादन

पिछली पोस्ट में आपने जगत की भ्रमरूपता के विषय में पढ़ा की किस प्रकार यह संसार न होते हुए भी इन्द्रियों के द्वारा दृश्यमान होता है और अनुभव में आता है !
इस प्रकार एक स्वाभाविक प्रश्न स्वतः ही जन्म ले लेता है, की फिर यहाँ किया हुआ पाप पुण्य सब, अच्छा-बुरा, आत्मा परमात्मा सब भ्रमरूप ही हैं !
परन्तु संसार को मिथ्या समझने पर कर्म विहीनता और पलायन की स्थिति उत्तपन्न होगी, जो समाज के लिए हितकर नहीं !! भारतीय दर्शन पलायान का नहीं अपितु कर्म का दर्शन है, ऐसे में महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित शास्त्र और श्रीराम को भगवान् बनाने वाला संवाद भला पलायन की अनुमति कैसे दे सकता है !
श्री योगवाशिष्ठ - श्रीराम और उनके गुरु वशिष्ठ जी के बीच हुआ संवाद है ! उत्तपति प्रकरण में वैराग्य हेतु वशिष्ठ जी श्रीराम को जगत की भ्रमरूपता का विभिन्न उदाहरणों द्वारा ज्ञान करते हैं ! तो निर्वाण प्रकरण (जो ग्रन्थ का अंतिम प्रकरण है) में श्रीराम भी एक जिज्ञासु शिष्य की भांति स्वाभाविक ही उत्त्पन्न होने वाले प्रश्न पूछते हैं - 
हे गुरुदेव ! आप, मैं आदि जो यह प्रत्यक्ष दृश्य पदार्थ हैं, जो भूत आदिरूप से अनुभव में आते हैं, वह है ही नहीं, यह कैसे समझा जाए ?
भूत, भविष्य और वर्तमान काल में होने वाला जो यह जो संसार का दर्शन है, जिसका सबको अनुभव हो रहा है, इसके होते हुए आप यह कैसे कह रहें हैं कि यह जगत कभी उत्त्पन्न ही नहीं हुआ, इसलिए है ही नहीं !!!
इस पर मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी महाराज कहते हैं - 
हे रघुनंदन - जीव चेतन है, जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है, बस इतनी सी बात ही समझ में आ जाए, तो संसार के मिथ्या होने का सत्य समझ में आ जाएगा ! 
जीव (आत्मा) चिन्मय परब्रह्म का अंश है, इसलिए कित्रिम नहीं है ! किन्तु अज्ञान के कारण ही जीव चेत्य (जिसका कारण चेतन ही है) अर्थात दृश्यजगत की और उन्मुख हो गया है ! जीवन से अर्थात प्राण और कर्मेन्द्रियों को धारण करने से और चेतन अर्थात ज्ञानेन्द्रियों को धारण करने से वह जीव कहलाता है!
मैं ब्रह्म हूँ इस यथार्थ आत्मस्वरूप को भूलकर जीवात्मा जब यह देखने लगता है कि मैं मनुष्य आदि शारीर हूँ और यह पृथ्वी आदि मेरा आधार है, तब वह उसी में दृढ आस्था बाँध लेता है ! असत्य में सत्य बुद्धि करके ही जीव भावनावश बंध जाता है, अपने भीतर ही वह विभिन्न प्रकार की कल्पना करने लगता है, जो जिसमें आसक्त होगा उसे वही तो दिखेगा सो जीव भी अपने से भिन्न संसार में आसक्ति रखता है, इसलिए उसे संसार ही दिखता है !
जब जीव अपने वास्तविक स्वरुप को मानकर - जानकर, स्वयं संसार रूप हो जाएगा अर्थात समस्त भूतो में स्वयं को ही देखेगा, स्वयं को ही सभी कार्यों का कारण मान लेगा तो, वह निस्वार्थ कर्म करेगा और उसका कर्म समाज के लिए अति हितकर हो जाएगा !
जगत को मिथ्या मानने का अर्थ यह नहीं है कि जगत को छोड़ दिया जाए, बल्कि इसका अर्थ तो यह है कि सम्पूर्ण विश्व को अपना लिया जाए ! 
यदि स्वामी रामदेव के शब्दों में कहा जाए तो - यहाँ कुछ छोड़ना नहीं है, वस्तुतः सूक्ष्म वस्तु को छोड़ कर विराट वस्तु  को अपना लेना है ! मानव से महा - मानव बनने के लिए व्यष्टि को छोड़ समष्टि को अपना लेना है !!!!!!!!!!

1 टिप्पणी:

सत्य के महासाधक को समर्पित



यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पूर्ति करने के लिए होते, तो भी लिखते-लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते !!
(कुरान, अध्याय ३१, पद ११)

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