सत्य, यह एक ऐसा तथ्य जिसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो जाते हैं, जीवन का आरम्भ क्यों होता है और उसका अंत क्यों होता है अर्थात मृत्यु क्यों होती है, इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है, संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं - भौतिक स्तर पर हमें जीवन-मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में केवल हम पदार्थ (भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं, परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता, कारण कौन है, मेरे मत से वही कारण ही सत्य है ! आइये इस प्रार्थना से आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए उस सत्य की खोज में -
ॐ असतो मा सद्गमय | तमसो मा ज्योतिर्गमय ||
मृत्योर्मामृतं गमय || ॐ शांति: ! शांति: ! शांति: !!!


26/01/2011

सर्वबंधनों और दुखों के मूल कारण

महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार सर्वबंधनों और दुखों के मूल कारण पांच क्लेश हैं - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, और अभिनिवेश !


अब इन कारणों को समझते हैं -

अविद्या - अनित्य में नित्य, अशुद्ध में शुद्ध, दुःख में सुख, अनात्म में आत्म समझना अविद्या है ! इस अविद्या रुपी क्षेत्र में ही अन्य चारों क्लेशों का जन्म होता है !

अस्मिता - चित्त जड़ रूप है, और चेतन पुरूष चिति कहा जाता है ! इस अविद्या के कारण जड़ चित्त और  चेतन पुरुष चिति में भेद नहीं रहता ! यह अविद्या से उत्पन्न हुआ चित्त और चिति में अविवेक अस्मिता क्लेश कहलाता है !

राग - चित्त और चिति में विवेक न रहने से जड़ तत्त्व में (सांसारिक भौतिक पदार्थों में) सुख की वासना उत्पन्न होती है ! अस्मिता क्लेश से उत्पन्न चित्त में सुख की इस वासना (इच्छा) का नाम राग है !


द्वेष - इस राग से सुख में विघ्नं पडने पर दुःख के संस्कार उत्पन्न होते हैं ! राग से उत्पन्न हुए दुःख के संस्कारों का नाम द्वेष है !


अभिनिवेश - दुःख पाने के भय से भौतिक शरीर को बचाए रखने की वासना उत्पन्न होती है, इसका नाम अभिनिवेश है !!


क्लेशों से कर्म की वासनाएं उतपन्न होती हैं ! कर्म -वासनाओं से जन्म रुपी वृक्ष उत्तपन्न होता है ! उस वृक्ष में जाति, आयु और भोग रुपी तीन प्रकार के फल लगते हैं ! इन तीनों फलों में सुख-दुःख रुपी दो प्रकार का स्वाद होता है ! 


जो पुण्य-कर्म अर्थात हिंसारहित दूसरे के हितार्थ कल्याणार्थ कर्म किये जाते हैं, उनसे जाति, आयु और भोग में सुख मिलता है और जो पाप - कर्म अर्थात हिंसात्मक दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए कर्म किये जाते हैं, उनसे जाति, आयु और भोग में दुःख पहुंचता है !


किन्तु यह सुख भी तत्ववेता की दृष्टि में दुःख रूप ही है, क्योंकि विषयों में परिणाम - दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःख मिला हुआ होता है, और तीनों गुणों के सदा अस्थिर रहने के कारण उनकी सुख-दुःख और मोहरूपी वृतियां भी बदलती रहती हैं ! इसीलिए सुख के पीछे दुःख के होना आवश्यक है !!!

1 टिप्पणी:

  1. बेनामी21/3/11, 1:58 pm

    जीवन के इस सत्य को जानकर मन को बहुत शांति का अनुभव हुआ है.
    और मैं भी इन नियमों का पालन करने की कोशिस करूँगा.

    उत्तर देंहटाएं

सत्य के महासाधक को समर्पित



यदि संसार के सभी पेड़ कलम होते और समुद्र स्याही होते और इस तरह सात समुद्र स्याही की पूर्ति करने के लिए होते, तो भी लिखते-लिखते अल्लाह के शब्द समाप्त न होते !!
(कुरान, अध्याय ३१, पद ११)

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